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रेगिस्तानी इलाकों में इसे ऊंट कटाळो के नाम से भी जाना जाता है

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कटेरी के पौधे का परिचय (Introduction of Kateri) रेगिस्तानी इलाकों में इसे ऊंट कटाळो के नाम से भी जाना जाता है  कटेरी एक प्रकार का कांटेदार पौधा होता है जो जमीन में फैला होता है। कटेरी के पत्ते हरे रंग के, फूल नीले और बैंगनी रंग के और फल गोल और हरे रंग के सफेद धारीदार होते हैं। इस कांटेदार पौधे के इतने गुण हैं कि आयुर्वेद में इसका उपयोग औषधि के रुप में किया जाता है। चलिये इस अनजाने जड़ी-बूटी के बारे में विस्तार से जानते हैं कि ये कैसे और किन-किन बीमारियों के लिए उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता है।                  ऊंट कटाळो(कटेरी) कटेरी का पौधा क्या होता है?  कटेरी का पौधा झाड़ी के रूप में जमीन पर फैला हुआ होता है। इसको देखने से ऐसा लगता है, जैसे कोई क्रोधित नागिन शरीर पर अनेकों कांटो का वत्र ओढ़े गर्जना करती हुई मानो कहती हो, मुझे कोई छूना मत। कटेरी में इतने कांटे होते हैं कि इसे छूना दुष्कर है, इसीलिए इसका एक नाम दुस्पर्शा है। कटेरी की कई प्रजातियां होती है परन्तु मुख्यतया तीन प्रजातियों 1. छोटी कटेरी (Solanum virginian...

आक, आकडो, अर्क

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आक :-  आक का  (वानस्पतिक नाम:Calotropis gigantea) एक औषधीय पादप है। इसको मंदार, आक, आकडो, अर्क और अकौआ भी कहते हैं। इसका वृक्ष छोटा और छत्तादार होता है। इसके पत्ते बरगद के पत्तों के समान मोटे होते हैं। हरे पत्ते पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं। इसका फूल सफेद छोटा छत्तादार होता है। फूल पर रंगीन चित्तियाँ होती हैं। फल आम के तुल्य होते हैं जिनमें रूई होती है। आक की शाखाओं में दूध निकलता है। वह दूध विष के समान होता है। आक का पौधा बारहमासी होता है , रेतिली भूमि पर बहुत ही ज्यादा होता है। चौमासे में ज्यादा पानी इकट्ठा होने पर आक सूख जाता है।                         आक का पौधा आक के पौधे शुष्क, उसर और ऊँची भूमि में प्रायः सर्वत्र देखने को मिलते हैं। इस वनस्पति के विषय में साधारण समाज में यह भ्रान्ति फैली हुई है कि आक का पौधा विषैला होता है, यह मनुष्य को मार डालता है। इसमें किंचित सत्य जरूर है क्योंकि आयुर्वेद संहिताओं में भी इसकी गणना उपविषों में की गई है। यदि इसका सेवन अधिक मात्रा में कर लिया जाये तो, उल्टी, दस्...

गुच्छी क्या है?

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गुच्छी (MOREL) वानस्पतिक नाम :-  Morchella esculenta(मार्कुला एसक्यूलेंटा') है।    गुच्छी बर्फ पिघलने के कुछ दिन बाद ही उगती है। इसका उत्पादन पहाड़ों पर बिजली की गड़गड़ाहट और चमक से निकलने वाली बर्फ से होता है। यह स्वाद में बेजोड़ और कई औषधियों गुणों से भरपूर है।  भारत और नेपाल में स्थानीय भाषा में इसे  'गुच्छी', छतरी, टटमोर, डुंघरू या जुमुला कहा जाता है।  गुच्छी उत्तराखंड, हिमाचल तथा कश्मीर सहित हिमालय के कई उच्च स्थानों में पाई जाती है।  हालांकि दुनिया में बहुत सी वैरायटी के मशरूम हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा गुच्छी मशरूम की ही होती है।  मशरूम दो तरह के होते हैं एक साधारण मसरूम जिसमें आमतौर पर बटन मशरूम कहते हैं ,जबकि दूसरे औषधीय महत्व वाले जिसमें गुच्छी जैसी मशरूम की प्रजातियां शामिल हैं।  अंतर्राष्ट्रीय बाजार में गुच्छी की कीमत काफी ज्यादा है। गुच्छी मधुमक्खी के छत्ते जैसी टोपी के कारण आसानी से पहचानी जा सकती है।  सेन्ट्रल एवं वेस्टर्न हिमालयी क्षेत्र के स्थानीय लोग इस मशरूम का इस्तेमाल कई सालों से स्वास्...

माननीय प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi जी अहमदाबाद के जाइडस कैडिला पार्क में कोरोना वैक्सीन के निर्माण कार्यों की समीक्षा करने पहुंचे।

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माननीय प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi जी अहमदाबाद के जाइडस कैडिला पार्क में कोरोना वैक्सीन के निर्माण कार्यों की समीक्षा करने पहुंचे।  लोगों ने घरों की छतों पर चढ़कर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का किया स्वागत ।

जसवंत थड़ा जोधपुर

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जसवंत थड़ा सफ़ेद संगमरमर से बना एक स्मारक है जो  मेहरानगढ़ के जोधपुर दुर्ग के पास स्थित है। इसे सन 1899 में जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय (1888-1895) की यादगार में उनके उत्तराधिकारी महाराजा सरदार सिंह जी ने बनवाया था। जसवंत थड़ा :- यह स्थान जोधपुर राजपरिवार के सदस्यों के दाह संस्कार के लिये सुरक्षित रखा गया है। इससे पहले राजपरिवार के सदस्यों का दाह संस्कार मंडोर में हुआ करता था। इस विशाल स्मारक में संगमरमर की कुछ ऐसी शिलाएँ भी दिवारों में लगी है जिनमे सूर्य की किरणे आर-पार जाती हैं। इस स्मारक के लिये जोधपुर से 250 कि, मी, दूर मकराना से संगमरमर का पत्थर लाया गया था। स्मारक के पास ही एक छोटी सी झील है जो स्मारक के सौंदर्य को और बढा देती है इस झील का निर्माण महाराजा अभय सिंह जी (1724-1749) ने करवाया था। जसवंत थड़े के पास ही महाराजा सुमेर सिह जी, महाराजा सरदार सिंह जी, महाराजा उम्मेद सिंह जी व महाराजा हनवन्त सिंह जी के स्मारक बने हुए हैं। 

रामपुरिया हवेली (बीकानेर):-

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रामपुरिया हवेली (बीकानेर) :- मरुभूमि को जल से नहलाने का कार्य स्वप्न जैसा ही था, परन्तु बीकानेर महाराजा गंगासिंह जी राठौड़ ने यह असंभव कार्य भी सम्भव कर दिया। इस महान कार्य को पूरा करने के लिए उन्होंने कई उद्योगपतियों से भारी कर्ज लिया था, जिनमें से एक उद्योगपति सेठ भंवर लाल को धन के बदले 1925 ई. में यह हवेली बनवाकर प्रदान की गई। रामपुरिया हवेली  के बारे में कई कहानिया प्रचलित है, साल 1920 में बीकानेर के महाराजा  गंगा सिंह  गंग नहर का निर्माण करवा रहे थे ताकि उनकी रियासत की प्रजा को खेती के लिए पानी मिल सके | इस नहर के निर्माण में काफी धन खर्च हुआ तो महाराजा ने भंवर लाल रामपुरिया नाम के एक अमीर उद्योगपति से एक बड़ी रकम कर्ज में मांगी औए बदले में उन्हें हवेली दी | साल 1925 तक ये हवेली बनकर तैयार हुई, हवेली का नाम यहाँ रहने वाले  रामपुरिया  परिवार की वजह से ही पड़ा।

महाराणा प्रताप का जीवन परिचय, युद्ध एवं वंशावली की संपूर्ण जानकारी

महाराणा प्रताप(1572—1597ई.) जन्म -9 मई 1540 ई. जन्म स्थान - कटारगढ़ (कुंभलगढ़) पिता—राणा उदय सिंह माता -जयवंता बाई (पाली के अखेराज सोनगरा की पुत्री)  पत्नी - अजमादे पॅंवार  भाई -जगमाल , शक्ति सिंह और सागर  पहाड़ी क्षेत्र में लोकप्रिय नाम - कीका  साहित्यिक नाम - पातल  प्रिय घोड़ा -चेतक मृत्यु —19 जनवरी 1597 * जगमाल— राणा उदय सिंह ने भटियाणी रानी धीरबाई के प्रभाव में आकर उसके पुत्र जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था जबकि ज्येष्टता के आधार पर यह प्रताप का अधिकार था। परन्तु प्रताप के शासक बनने पर अकबर की सेवा में चला गया अकबर ने उसे जहाजपुर परगना जागीर में दे  । बाद  मैं उसे आधा सिरोही राज्य दे दिया गया। सिरोही के राव सुल्तान के साथ दत्तानी के युद्ध (1583ई. )मैं जगमाल की मृत्यु हो गई। * शक्ति सिंह—  यह अपने पिता से रूठकर अकबर की सेवा में चला गया था ।चित्तौड़ पर अकबर के आक्रमण के समय (1567 - 68) मैं इसकी मृत्यु हो गई ज्ञात लेखकों के अनुसार हल्दीघाटी के युद्ध में जब प्रताप का घोड़ा चेतक घायल हो गया तो शक्ति सिंह ने  जो उस समय मुगलों के साथ था, ...