महाराणा प्रताप का जीवन परिचय, युद्ध एवं वंशावली की संपूर्ण जानकारी

महाराणा प्रताप(1572—1597ई.)
जन्म -9 मई 1540 ई.
जन्म स्थान - कटारगढ़ (कुंभलगढ़)
पिता—राणा उदय सिंह
माता -जयवंता बाई (पाली के अखेराज सोनगरा की पुत्री)
 पत्नी - अजमादे पॅंवार 
भाई -जगमाल , शक्ति सिंह और सागर 
पहाड़ी क्षेत्र में लोकप्रिय नाम - कीका 
साहित्यिक नाम - पातल 
प्रिय घोड़ा -चेतक
मृत्यु —19 जनवरी 1597

* जगमाल—राणा उदय सिंह ने भटियाणी रानी धीरबाई के प्रभाव में आकर उसके पुत्र जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था जबकि ज्येष्टता के आधार पर यह प्रताप का अधिकार था। परन्तु प्रताप के शासक बनने पर अकबर की सेवा में चला गया अकबर ने उसे जहाजपुर परगना जागीर में दे  । बाद  मैं उसे आधा सिरोही राज्य दे दिया गया। सिरोही के राव सुल्तान के साथ दत्तानी के युद्ध (1583ई. )मैं जगमाल की मृत्यु हो गई।

*शक्ति सिंह— यह अपने पिता से रूठकर अकबर की सेवा में चला गया था ।चित्तौड़ पर अकबर के आक्रमण के समय (1567 - 68) मैं इसकी मृत्यु हो गई ज्ञात लेखकों के अनुसार हल्दीघाटी के युद्ध में जब प्रताप का घोड़ा चेतक घायल हो गया तो शक्ति सिंह ने  जो उस समय मुगलों के साथ था, प्रतापगढ़ का घोड़ा दिया।
* सागर—यह भी मुगल सेवा में चला गया था।
*प्रताप का  राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572ई. को गोगुंदा में हुआ था।

* प्रताप के शासक बनने तक सिरोही के राव सुल्तान और मारवाड़ के राव चंद्रसेन को छोड़कर राजपूताने के सभी शासक मुगलों की अधीनता स्वीकार कर चुके थे तथा मेवाड़ की दक्षिणी और दक्षिणी पूर्वी सीमा ही मुग़ल प्रभाव से मुक्त थी।

  अकबर द्वारा राणा प्रताप के पास भेजे गए दूत मंडल—
01. जलाल खान —नवंबर 1572ई.
02. मानसिंह —जून 1573ई.
03. राजा भगवानदास— अक्टूबर 1573ई.
04. राजा टोडरमल— दिसंबर 1573 ई.


*कर्नल टॉड ने राणा प्रताप और मानसिंह की भेंट उदय सागर की पाल पर होना बताया है। जबकि अबुल फजल के अनुसार गोगुंदा में इनका मिलन हुआ था।
* अबुल फजल के अनुसार राजा भगवानदास के समझाने पर प्रताप ने साही खिलत स्वीकार कर ली थी परंतु राणा के व्यक्तिगत रूप से मुगल दरबार में उपस्थित होने की बात पर समझौता टूट गया।

हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून 1576 ई.)

गोपीनाथ शर्मा ने हल्दीघाटी के युद्ध की तिथि 21 जून 1576ई. मानी है।
इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व आमेर के कुंवर मानसिंह ने किया।
आसिफ खान उसका सहायक सेनापति था। यह प्रथम अवसर था जब मानसिंह को किसी अभियान का स्वतंत्र सेनापति बनाया गया।
2 अप्रैल 1576 को मानसिंह अजमेर से चला तथा दो माह मांडलगढ़ में रहकर इस युद्ध की रूपरेखा बनाई।
हल्दीघाटी या रक्त तलाई राजसमंद जिले में नाथद्वारा से करीब 11 मील दक्षिण पश्चिम में गोगुंदा और खमनोर के बीच तंग घाटी क्षेत्र है।
युद्ध में हकीम खान सूर ने प्रताप की सेना के अग्रभाग का नेतृत्व किया था ।भील जनजाति भी अपने नेता पूंजा के साथ इस युद्ध में प्रताप की ओर से लड़ी।
युद्ध के दौरान जब मुग़ल सेना पीछे हटने लगी तो मिहतर खान नामक मुगल अधिकारी ने यह अफवाह फैला दी कि बादशाह स्वयं युद्ध स्थल पर पहुंच रहे हैं।
घायल होने पर राणा प्रताप युद्ध को बीच में छोड़कर चले गए इसी दौरान बलीचा राजसमंद नामक स्थान पर प्रताप के घोड़े चेतक की मृत्यु हुई जहां उसकी छतरी बनी हुई हैं।
महाराणा प्रताप के बाद सादड़ी के झाला बिंदा ने राजपूत सेना का नेतृत्व किया। बिदा के मरते ही युद्ध समाप्त हो गया और मुगल सेना  विजयी रही।
युद्ध की समाप्ति के बाद राणा प्रताप ने कोल्यारी गांव पहुंचकर अपना और अपने सैनिकों का इलाज करवाया इसके बाद प्रताप ने कुंभलगढ़ को मुगल विरोध का केंद्र बनाया।
इस युद्ध में मुगल सेना में इतिहासकार बदायूंनी भी शामिल था। बदायूंनी ने इसे गोगुंदा का युद्ध और अबुल फजल ने खमनोर का युद्ध कहां है। सर्वप्रथम जेम्स टॉड ने इस युद्ध को 'हल्दीघाटी का युद्ध' नाम दिया।
हल्दीघाटी के युद्ध के बाद नवंबर 1576 ई. मैं स्वयं अकबर ने मेवाड़ अभियान किया तथा उदयपुर को जीतकर उसका नाम मुहम्मदाबाद कर दिया।

कुंभलगढ़ पर मुगलों का अधिकार (1578 ई.)

अक्टूबर 1577 ई.में अकबर ने शाहबाज खान को मेवाड़ अभियान पर भेजा शाहबाज खान ने प्रताप की मौजूदा राजधानी कुंभलगढ़ पर आक्रमण कर दिया।
राणा प्रताप दुर्ग की रक्षा का भार भान सोनगरा (पाली के अखेराज सोनगरा का पुत्र) को सौंपकर स्वयं पहाड़ियों में चला गया। राजपूत योद्धा लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए तथा 3 अप्रैल 1578 ईस्वी को कुंभलगढ़ पर शाहबाज खान का अधिकार हो गया यह प्रथम अवसर था जब कुंभलगढ़ दुर्ग किसी आक्रमणकारी द्वारा जीता गया।
अब्दुर्रहीम खानखाना का मेवाड़ अभियान (1580ई.)—

अब्दुर्रहीम खानखाना ने शेरपुर को केंद्र बनाया जहां कुंवर अमर सिंह ने हमला कर खानखाना के परिवार को कैद कर लिया परंतु राणा प्रताप के आदेश पर खानखाना के परिवार को  सम्मानपूर्वक रिहा कर दिया गया।

दिवेर का युद्ध अक्टूबर (1542 ई.)—

अकबर ने मेवाड़ पर नियंत्रण हेतु चार मुगल थाने  स्थापित किए थे—
01.दिवेर (राजसमंद)
02.देसुरी (पाली)
03.देवल (डूंगरपुर)
04.देबारी (उदयपुर)

अक्टूबर,1582 ई. में राणा प्रताप कुंवर अमर सिंह और मंत्री भामाशाह आदि ने महत्वपूर्ण चौकी दिवेर पर आक्रमण कर दिया। मुगल थानेदार सुल्तान खां मारा गया। इस हमले में अमर सिंह ने विशेष वीरता का प्रदर्शन किया था।
जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी को 'मेवाड़ की थर्मोपोली' और दिवेर को 'मेवाड़ का मैराथन' कहा है।
दिवेर विजय के बाद राणा प्रताप ने मेवाड़ राज्य की प्राप्ति के लिए एक लंबा संघर्ष प्रारंभ किया। जिसमें राणा ने चित्तौड़गढ़ और मांडलगढ़ को छोड़कर मेवाड़ के अधिकांश भागों पर पूनः अधिकार कर लिया था।
अकबर ने राणा प्रताप के विरुद्ध अंतिम सैनिक अभियान जगन्नाथ कछवाह के नेतृत्व में 1584- 85 में भेजा था।

चावंड पर अधिकार (1585 ई.)—
राणा प्रताप ने राठौड़ लूणा चावंडिया को पराजित कर चावंड पर अधिकार कर लिया तथा 1585 ई. में इसे अपनी राजधानी बनाया चावंड अगले 28 वर्षों तक (1585 -1613ई. )मेवाड़ की राजधानी रही ।चावंड में महाराणा प्रताप ने चामुंडा माता का मंदिर बनाया था।
कुंभलगढ़ से निकलने के बाद (1578 ई.)में राणा प्रताप के मंत्री भामाशाह ने राणा को अपनी समस्त संपत्ति प्रदान की थी। जेम्स टोड ने इसी कारण भामाशाह को 'मेवाड़ का कर्ण 'कहा है। 19 जनवरी, 1597 ई.को चावंड में स्वतंत्रता के महान पुजारी और देशाभिमान के प्रतीक महाराणा प्रताप का देहांत हो गया ।प्रताप का अंतिम संस्कार बाडोली (उदयपुर )में किया गया जहां उनकी आठ खंभों की छतरी स्थित है।

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