जम्भेश्वर भगवान द्वारा बताए गए 29 नियम:-

जांभोजी अपने 29वें 'इलोल सागर' शब्द में फरमाते हैं- 
'सांझे जमो ,सवेरे थापण  गुरु की नाथ डरीलो।'
 सांयकाल (रात्रि) में हरिकीर्तन, प्रातः हवन वह पाहल विश्नोई को अभीष्ट है। 29 नियम रूपी मेरी नाथ अर्थात सद्गुरु की मर्यादा का अंकुश है इनका पालन पूर्णतया करने पर सच्चा विश्नोई कहलाता है‌।
नियम 01. 30 दिन सूतक रखना:-
बच्चे को जन्म देने वाली माता को 30 दिन तक घर के कार्यों को हाथ लगाना गाय दुहना अधिकारियों से निवृत्ति लेनी चाहिए
नियम 02. पांच दिन ऋतुवन्ती न्यारो:-
5 दिन रजस्वला (रजोधर्म) स्त्री का पार्थक्य।  मासिक धर्म स्त्रियों को भी उक्त सारे कार्य वर्जित होते हैं भूमि पर टाट सन पर सोना चाहिए खाने-पीने के बर्तन अलग रखना चाहिए।
नियम 03.सेरा करो स्नान:-
आसनोजी भाट की बही में जांभोजी के कथन को उद्धृत करते हुए लिखा गया है कि प्रातः मुंह अंधेरे शरीर को रोमावाली न दिखे तब तक स्नान कर लेना चाहिए। काफी वर्ष पहले की बात है एक बार एक संत महापुरुष मेरे द्वार पर आए और यह वचन कहे- भक्त सुबह 3:00 बजे उठकर शौच आदि से निवृत्त होकर जो स्नान कर लेता है उसको एक मन मोती दान करने का फल मिलता है 4:00 बजे उठने वाले को एक मन सोना 5:00 बजे उठने वाले को एक मन चांदी 6:00 बजे उठने वाले को एक मन दूध सूर्योदय तक उठकर स्नान करने वाले को स्नान में काम लिए उतने जल दान का फल मिलता है। उनसे मिली इस शिक्षा की मैंने गांठ बांध ली और तब से प्रातः 4:00 बजे उठकर स्नान करने का नियम बना लिया अपवाद अपरिहार्य स्थिति को छोड़कर दिन उगने से पहले स्नान करने से कभी नागा नहीं किया सुबह आंख खुलते ही ओम विष्णु का स्मरण करें वे धरती पर पांव रखने से पहले धरती माता से प्रार्थना करें :-
धरती माता तू बड़ी ,तुझ से बड़ा न कोय, 
जो उठ तौ पर पांव धरूॅ ,दोष  न लागे कोय‌। 
समुद्र वसने देवी ,पर्वत स्तन मंडले ।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं ,पाद स्पर्श क्षमस्व में।।
समुंद्र रूपी वस्त्रौ व पर्वत रूपी स्तनों वाली देवी मैं तुम्हें पांवो से स्पर्श कर रहा हूं:- मुझे क्षमा करें।
 प्रात उठकर रात को तांबे के पात्र में रखा हुआ एक लोटा पानी गिलास से मुंह लगाकर धीरे-धीरे पीने वालों के लिए अमृत के समान होता है इसकी मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाकर डेढ़ लीटर करने पर तो मानव स्वास्थ्य का बीमा ही हो गया समझे इतना पानी पीते ही शोच जाने की शंका होगी ही होगी कब्ज कभी नहीं रहेगी और कब्ज तो सभी रोगों की जड़ होती है -
प्रातः उठ  एक लोटा जल जो पीवे ,उस घर वेद कबूल नहीं आवे‌।
 भारत भर में वर्णित एक वेद ने वर्षों पहले बताया था कि लघु शंका में शौच के समय दोनों जबडो को कश्ते हूए दांतों को भी रखा जाए तो दांत मजबूत बने रहेंगे।
स्नान-विधि:-   छोटे बालक वृद्ध एवं रोगी के अलावा एक स्वस्थ व्यक्ति को सर्दी गर्मी व बरसात ऋतु में वर्ष पर्यंत ठंडे जल से नहाना स्वास्थ्यवर्धक होता है जिस जल से स्नान कर रही हो उस पानी को मुंह में भरकर कुल बुलाते रहे व स्नान करने के बाद कुल्ला थूक दें इससे आंखों की ज्योति बरकरार रहेगी वे सर्दियों में जुखाम की संभावना कम रहेगी स्नान करते समय प्रथम सिर पर पानी डालें सुबह उठकर मुंह में ठंडा पानी भरके आंखो को खुला रखते हुए चिंटू चिंटू धोने से भी आंखें स्वस्थ रहती हैं स्नान से पहले दांतों में ब्रश करना चाहिए सर्दी में स्नान से पहले सरसों के तेल की मालिश करने से चमड़ी में खुश्की नहीं रहती है स्नान करने के बाद विधार्थी को कम से कम दो-तीन घंटे स्वाध्याय करना चाहिए आजकल प्राय रीवाज सा बन गया है कि विधार्थी देर रात 1,2 बजे तक पढ़ते रहते हैं वे सुबह 9,10 बजे तक सोए रहते हैं इससे शरीर में दिमाग दोनों की हानि निश्चित है।
श्री जंभेश्वर भगवान ने (शब्द 104) में फरमाया.....मांनू एक शुचील सनानूं।    
बिजनौर उत्तर प्रदेश का बनिया( बिश्नोई) कुलचंद्र चौधरी 30 सेर सोना लेकर समराथल भर जांभोजी के पास आया और सोने की भेंट चढ़ा कर प्रातः स्नान के धर्म से मुक्ति चाहिए परंतु जांभोजी ने भाई यह सूची स्नान को सबसे अहम बताया और कहा कि सोना वस्त्र 5लाख घोड़े पर हाथी कन्यादान इन सबसे बढ़कर स्नान का स्थान सर्वोपरि है।
नियम04.शील ,संतोष ,शुचिता धारण करना:-
शील अर्थात चरित्र सुद्धि रखनी चाहिये।संतोष धारण करना चाहिये  सुचिता से अर्थ पवित्रता से हैं ।बाहरी सुद्धि स्नान से वह आंतरिक शुद्धि भगवान के नाम जप,ध्यान व तप से होती हैं। हमारी वासनांए (लोभ)कैंसर के रोग के समान है। संतोषी ही उपचार है।

शील-'जां जां पाले न शीलूं,तां तां कर्म कुचीलू'(शब्द२०)

जो पुरुष शील धर्म अर्थात शुद्ध आचरण नहीं करता अर्थात चोरी ,छल -कपट ढोंग आदि कार्यों में प्रवृत रहता है ,उसके कर्म मलीन होते हैं।

शील -'शील विवर्जित जीव दुहेलो,यम पुरीये संताइये'(शब्द ३०)
जो व्यक्ति शील वह शुद्ध आचरण से रहित है ,उसे मरणोपरांत यमपुरी में दुख भोगना पड़ता है।

संतोष:-'गुरु आप संतोषी ,अवरा पोषी'(शब्द ०१)
गुरु स्वयं सदा संतुष्ट रहते हैं वे दूसरों का पोषण करते हैं।

शुचिता:-......'मानूं एक शुचील सनांनू'(शब्द १०४)
बिजनौर का सेठ कुलचंद्र अग्रवाल 30 सेर सोने की भेंट चढ़ा कर जांभोजी से शील वह स्नान धर्म की छूट मांगने आया परंतु जांभोजी ने आंतरिक शुद्धि रूपी शील अर्थात चरित्र सुद्धि व बाह्य सुद्धि  स्नान को तीन लोक की संपदा से भी बढ़कर बताया।

शुचिता-'जा दिन तेरे होम न जाप न तप न क्रिया, गुरु न चीन्हौ पंथ न पायो अहल गई जमवारूॅ'(शब्द१३)
जिस दिन तेरे घर में हवन भगवन्नाम जप शौच स्नान उत्तम क्रिया नहीं हुए, तो उस दिन तुम गुरु की बताये उत्तम मार्ग को भूल गया व परमात्मा के समीप न जा सका।
नियम 05.द्विकाल संध्या करना:-
दिन  उगने से 24 मिनट (1 घड़ी) पहले वह बाद में तथा सूर्यास्त से 24 मिनट पहले फिर बाद में संध्या का समय होता है इस समय में नवण मंत्र ,गुरु मंत्र ,ॐ विष्णु का यथा योग्य जप करना चाहिए।

नियम 06.सांय आरती करना:-
शाम के समय आरती व विष्णु भगवान के गुणगान हेतु साखी व  भजन बोलते हुए जमे की परंपरा का निर्वहन करना चाहिएं।
'सांझे जमो सवेरे थापन गुरु की नाथ डरीलो' 
सांयकाल में भगवान की कीर्ति रूपी आरती में जमा -जागरण व प्रातः काल विधि पूर्वक हवन 29 नियम व पाहल यह जांभोजी की मर्यादाएं है।

नियम 07नित्य हवन करना:-
प्रत्येक विश्नोई को गाय के छात्रों(सूका गोबर) से धूपिया तैयार करके प्रतिदिन हवन अवश्य करना चाहिए हवन में गाय का घी प्रयुक्त करना चाहिएं।
' होम हित चित सूं होय बास बैकुण्ठा पांवों।'
29 धर्म की आखरी में ऐसा कहकर सातवें नियम का निर्देश किया गया है जांभोजी अपने शब्द संख्या सात में फरमाते हैं ।
जा दिन तेरे होम न जाप न तप न  क्रिया जाण  के भागी कपिला गाई।।
अर्थात जिस दिन पवित्र हिंदुओं विश्नोइयां के घर में हवन भगवान के नाम का जब तक प्रतिक्रिया नहीं हुई उस दिन यह समझो कि तुम्हारे घर से कपिला अर्थात बुद्धि रूपी गाय भाग गई है धर्म का पालन न करने पर धर्म उस व्यक्ति को छोड़कर चला जाता है अतः हर विष्णु के घर में प्रतिदिन हवन अश्वयमेव होना चाहिए। जिस घर में हवन नहीं होता है वह शमशान की श्रेणी में आता है जांभोजी अपने पोत्र नाथाजी से  कहते हैं- दत्त चित्त से होम कर, राखै बहुत आचार।

नियम 08.पानी छानकर पीना
नियम 09. वाणी विचार कर बोलना:-
वाणी को पहले सोच-विचार कर ह्रदय रुपी तराजू पर तोल कर फिर बोलना चाहिए मन में जो आए वैसे नहीं बोलना चाहिए आमतौर पर हम वाणी के प्रति गंभीर नहीं रहते हैं घर यहां आस-पास के वातावरण से मिले शब्द हमारी जुबान पर सवार हो जाते हैं या हमारे संस्कारों पर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है इस दोहे के शब्दों को हम जीवन में डाल लेंगे तो हमारी वाणी संस्कारित हो जाएगी। 
वाणी एक अमोल है जो कोई बोलै जानि ।
ह्रदय तराजू तोल के तब मुख बाहर आनि।।

नियम 10. ईंधन व दुध  छानकर काम में लेना:-

नियम 11.क्षमा धारण करना।
नियम 12.दया धारण करना ।
नियम 13.चोरी नहीं करना ।
नियम 14.निंदा नहीं करना ।
नियम15.झूठ नहीं बोलना।
नियम 16.अमावस्य का व्रत रखना ।
नियम 17.भगवान विष्णु का भजन करना।
नियम 18.जीवों की रक्षा करना ।
नियम 19.रूंख लीला नहीं घावे (हरे वृक्ष नहीं काटना चाहिए)।
नियम 20.काम क्रोध,लोभ,मोह, अहंकार को जीते।
नियम 21.अपने हाथ से रसोई बनाना।
नियम 22.थाट अमर ‌रखवाना।
नियम 23.बैल बधिया न करवाना।
नियम 24.अफीम नहीं खाना।
नियम 25.तंबाकू नहीं खाना।
नियम 26.भांग नहीं पीना ।
नियम 27.मद्द(शराब) नहीं पीना चाहिए।
गिलासों में जो डूबे ,उभरे नहीं जिंदगानी में।
 हजारों  बह गए ,इन बोतलों के बंद पानी में।।
नियम 28.मांस नहीं खाना चाहिए।
नियम 29.नील का प्रयोग नहीं करें।

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