बिश्नोई पंथ की स्थापना -कब व क्यों?

विक्रम संवत 1542 (सन 1485 ) भयंकर अकाल पड़ा। लोग मालवा की ओर पलायन कर रहे थे ।समराथल धोरे पर जांभोजी विराजमान थे ।जांभोजी ने उन्हें धोरे के नीचे स्थित नाडिये की मिट्टी ऊपर डालने के एवज में पर्याप्त अन देने का वचन दिया लोगों का पलायन रूक गया। उन्हें खाने को अन्न व बरसात होने पर बीज बोने के लिए भी बीजू की व्यवस्था की ।भंगवी चादर के नीचे से आवश्यकतानुसार अन्न लेने पर भी अटूट अन्न भंडार से उन्हें जांभोजी पर अटूट श्रद्धा हो गई ।29 नियमों का पालन करने से धन की पूर्ति का भरोसा दिया ।विक्रम संवत 1542 (सन् 1485)कि कार्तिक वदी अष्टमी को जांभोजी ने बिश्नोई पंथ की स्थापना की ।स्थापना में जांभोजी के खून के रिश्ते के चाचा पुल्होजी ने सशरीर स्वर्ग दिखाने की कामना की। जांभोजी ने मनसा रूपी विमान बनाकर उन्हें स्वर्ग दिखाया। वापस आने पर हवन करके पाहल बनाया और सबसे पहले पूलहोजी को बिश्नोई पंथ में दीक्षित किया इस प्रकार  पूल्होजी बिश्नोई पंथ के प्रथम विश्नोई हुए ।29 नियम की पालना रुपी मर्यादा के पालन को आबद्ध किया। सभी प्रकार के नशों के वर्जन वह भगवान विष्णु के ध्यान ,जप व हवन रूपी विश्नोई पंथ के 29 नियम बनाए।

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