विश्नोई समाज के प्रमुख तीर्थ स्थल:-

01.पीपासर (जिला नागौर, मुकाम (नोखा बीकानेर)से 16 किमी .दक्षिण और नागौर से 54 किमी उत्तर में)

यह जांभोजी का जन्म स्थान है वर्तमान साथरी उनके घर की सीमा में ही है । जिस कुएं के पास जांभोजी ने पहला शब्द का था वह गांव में है और अब बंद कर दिया गया है। कूंए ओर साथरी के बीच एक पुराना खेजड़ा है, जहां राव दूदा ने अपना घोड़ा बांधा था । साथरी की पूर्व दिशा में 'पैनोरमा 'बनाया हुआ है ,जिसमें जांभोजी का जीवन वृत दिया हुआ है।

02.समराथल (जिला -बीकानेर, नोखा से 20किमी. दूर)
बिश्नोई पंथ की स्थापना इसी धोरे पर की थी। 51वर्ष तक यही जांभोजी का मुख्य स्थान रहा। यह एक बहुत ऊंचा धोरा है, जहां जांभाणी परंपरा के आगुणी व आथुणी जागा के संतों के आश्रम बने हुए हैं। जांभोजी इस धोरे के शिखर पर बैठकर हवन करते थे, या भव्य मंदिर बना हुआ है चारों और हरि कंकेड़ी के वृक्ष है ।इसका दूसरा नाम धोक धोरा है धर्म प्रचार करते हुए जांभोजी यहीं आकर विराजते थे। इसे सोवन नगरी ,थल,सम्भरी आदि नामों से भी जाना जाता है।

03.लोहावट(जिला -जोधपुर ,फलोदी से 32किमी. दक्षिण की ओर)
लोहावट रेलवे स्टेशन से लोहावट साथरी 3 किमी. पूर्व की ओर है । इस साथरी से दक्षिण-पश्चिम में स्थित धौरे को 'धोक धोरा' कहते हैं। यहां जांभोजी ने हवन किया था ।साथरी के निज मंदिर में जांभोजी के बाएं पैर का निशान बना हुआ है। संवत 1584 (सन 1527 ईस्वी) में यही कुएं पर मालदेव का जांभोजी  से मिलन हूआ था। साथरी के चारों ओर औरण है।

04.जांगलू 
      (जांगलू गांव से 7किमी. दक्षिण -पश्चिम की ओर)
साथरी के उतर कि ओर एक छोटी चौकी बनी है। इस स्थान पर जांभोजी ने हवन किया था ।जांगलू गांव और साथरी के बीच 'बरीग आळी'  नाड़ी पड़ती है ।इसे बरसिहं बणीयाळ ने खुदवाया था। ये स्याणोजी जी के पुत्र थे। हर  अमावस्या को  दूर -दूर के श्रद्धालु यहां आकर मिट्टी निकालते थे।

05.पिछोवडो(जांगलू)
जांगलू गांव के बीच एक बहुत बड़ा मंदिर है ।विक्रम संवत 1598 (सन 1541 ई.) में मेहोजी थापन जांभोजी की 3 वस्तुएं - चोला, चींपी  ओर  टोपी लेकर यहां आ गए थे । मुकाम के थापनों के आग्रह पर टोपी उन्होंने वापस लौटा दी थी। वर्तमान मंदिर में रखे चोला और चीपीं मेंहोजी के लाए हुए बताए जाते हैं ।श्रद्धालु भक्तजन यहां चींपीं की नाप की एक चींपी  घी यहां चढ़ाते हैं।मेहोजी पीछे से अर्थात चोरी से यह वस्तुएं लाए थे। इसलिए इसे पिछोवड़ा कहते हैं । मंदिर के पास मेंहोजी की समाधि है यहां प्रति अमावस्या मेला लगता है।
06.रोटू
    (तहसील -जायल ,जिला- नागौर ,नागौर से 52 किमी. पूर्वोत्तर में)
यहां एक विशाल मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर की दक्षिण दिशा में स्थित चौक में उमा (नौरंगी) का भात भरने के लिए आए जांभोजी का रथ रुका था। यहां के लोगों की प्रार्थना पर जांभोजी ने एक रात में रोटू की शरद में खेजड़ी वृक्षओं का बाग लगा दिया था।
 रोटू की सरहद में घुसते ही एक जैसी 500 वर्षों से अधिक पुरानी खेजडिया आज भी जांभोजी के खेजड़ी बाग लगाने की शहादत देती है ।यहां की चिड़िया रैन बसेरा यहां करके चुगा चुगने अन्यत्रत् चली जाती हैं मंदिर में स्थित खांडा हुजूरी कवि केसोजी का बताया जाता है।

 07. जाम्भोलाव
       (फलोदी से 29 किमी. पूर्वोत्तर में)
यहां एक बड़ा तालाब और उसके ठीक उत्तर दिशा में भव्य मंदिर है ।इस तालाब की नींव मार्गशीर्ष पंचमी वार बुधवार विक्रम संवत 1566(1509ई.) पुष्य नक्षत्र में रखी गई थी ।जांभोजी ने इसे आदि तीर्थ कहा है। तालाब खुदाई में लगभग 6 महीने लगे थे। इस दरमियान जांभोजी स्वयं यहां सिंहासनस्थ  रहे। मंदिर से पूर्व में जांभा गांव में 'अगुणी जागा' और 'आथुणी जागा' नाम से दो विश्नोई साधु परंपरा के आश्रम है। निज मंदिर में मकराना के सफेद पत्थर से निर्मित पूर्वाभिमुख एक सिहासन स्थापित है ।यहां स्थित तालाब की मिट्टी निकालने का महात्म्य है। इसे किसन तीर्थ ,विसन तीर्थ,  कलयुग का तीर्थ आदि नामों से भी जाना जाता है। यहां कपिल मुनि द्वारा तपस्या करने व पांडवों द्वारा यज्ञ करने का वर्णन साखियों में मिलता है। या चैत्र वदी अमावस के दिन बड़ा मेला वह भादवा सुदी पूर्णिमा को छोटा मेला प्रतिवर्ष लगता है इसकी महिमा प्रयाग संगम के समान मानी जाती हैं भादवा सुदी पूर्णिमा के मेले को 'माधा मेला' के नाम से जाना जाता है।

08.रणीसर
     (फलोदी-जोधपुर से 42किमी.पूर्व में स्थित)
यहां रणीसर गांव से पूर्व में पूल्होजी की साथरी थी,जिसे एक विशाल मंदिर के रूप में परिणत तय किया गया है ।जांभोजी अपनी 10 वर्षीय विशाल धर्म यात्रा से लौटकर जांभोलाव से समराथल जाते हुए यहां जहां रुके थे वह स्थान 'जंभ- थालिया' के नाम से जाना जाता है। जांभोजी के  मोक्ष धाम गमन के संकेतों को देखकर रणीसर साथरी स्थल पर उनके चाचा पाहल लेकर सबसे पहले बिश्नोई पंथ की दीक्षा लेने वाले पूल्होजी ने जहां समाधि ली थी उसी पर मंदिर निर्मित है। या मंदिर अगुणी जागा की संत परंपरा के अधीन है या जांभोजी के चरण चिन्ह से अंकित पत्थर समाधि मंदिर में स्थापित है।

09.भींयासर
तहसील फलोदी जिला जोधपुर  भीयासर गांव  से 3 किमी. पश्चिम में साथरी है ।आऊ के ठाकुर दलपतसिंह पातावत राठौड़ ने विक्रम संवत 1936 में 259 बीघा भूमि गोचर भूमि के रूप में प्रदान की थी जहां आज ओरण है सिद्ध कवि सुजन दास जी पूनिया भीयासर गांव के ही थे।

10. रामड़ावास 
(जोधपुर जिला मुख्यालय से 47 किमी. पूर्व में)
 जोधपुर जिला मुख्यालय से 47 किमी. पूर्व में स्थित इस गांव में विल्जीहो का पूर्वाभिमुख भव्य मंदिर और पास ही साथरी  है ।मंदिर में विल्होजी की समाधिस्थ  मूर्ति भी है।साहबराम जी राहड ने मंदिर  को पूरा करवाया था।

11.लालासर
बीकानेर से 52 किमी दक्षिण पूर्व में लालासर गांव से थोड़ी दूरी पर जिसके चारों ओर जंगल है इसमें लगे हुए कंकेड़ी वृक्ष के नीचे जांभोजी ने परम धाम (मोक्ष) गमन किया था ।इसके पश्चिम में जांभोजी का पुरवाभिमुख भव्य मंदिर बनाया गया है ।यहा कंकेड़ी की परिक्रमा मनोवान्छित फलदाई मानी जाती है ।मूख्य  अष्ट जांभाणी में से मुकाम स्थित बिश्नोई सेवक दल के अलावा यही एक मात्र स्थान है जहां बारहमासी भंडारा संचालित हो रहा है या वृक्षारोपण से  यह स्थान रमणीय लगता है।
12.मुकाम
नोखा बीकानेर से 17 किमी पूर्व में इस स्थान पर जांभोजी का समाधि मंदिर है जांभोलाव व समराथल के समान मुकाम की मान्यता है फाल्गुन अमावस्या को यहां बड़ा मेला व आसोज की अमावस्या को छोटा मेला भरता है। इन मेलों की शुरुआत विल्हो जी ने करवाई थी ।इसके पास ही तालवा गांव है । मंदिर के शिखर पर लगा त्रिशूल समाधि खोदते समय 24 हाथ की गहराई पर मिला था। विल्होजी ने मुकाम मंदिर में ही विक्रम संवत 1611में दीक्षा ग्रहण की थी। विश्नोई साधुओ व थापनो के मंदिर चालन के पश्चात विक्रम संवत 1977 (25 जून 1920 )में मंदिर का संचालन पंचायत को सौंप दिया गया था । सन 1944 में इसका संचालन निरंतर अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के हाथ में है ।

12. जाजीवाल धोरा
जाजीवाल बिश्नोईयों की ढाणीओं से डेढ़ किलोमीटर दूर पश्चिम में स्थित धोरा जोधपुर से 28 किमी दूर अवस्थित है धोरे के चारों और हरी कंकेडीयां उबड़ खाबड़ जंगल है इस धोरे का नाम 'नारथला' था जिसे विक्रम संवत 2033 सन 1976 में परिवारिक आचार्य स्वामी भागीरथ दास जी आचार्य ने अपनी तपोभूमि बनाया शुरू में एक कंकेड़ी के नीचे माला फेरते थे। जो माला स्थली के नाम से प्रसिद्ध है । वर्तमान में यह जंभेश्वर धोरा के नाम से जाना जाता है 40 सालों में यह एक सिद्ध तपोभूमि बन चुका है प्रतिवर्ष आसोज महीने में भागवत की कथा होती है जंभेश्वर मंदिर, संतों की कुटिया,  धर्मशाला गौशाला आरक्षण स्थल आदि से एक मनभावन तपोस्थली बन चुका है सर्दी के मौसम में या सात समुंदर पार से कुर्जा पक्षियों का झुंड आता है जिससे प्रतिदिन चार पांच कि्वटल  चुगा डाला जाता है।


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