राणा सांगा एवं झाली रानी द्वारा गुरु जांभोजी की आज्ञा मानना:-
मेवाड़ के राणा सांगा और झाली रानी गुरु जांभोजी के विचारों से बहुत प्रभावित थे। गुरु जांभोजी के उपदेशों से प्रभावित होकर वे उनकी आज्ञा का पालन करते थे। गुरु जांभोजी की शिक्षा के कारण ही राणा सांगा ने अपने राज्य में बिश्नोईयों के लिए चुंगी माफ कर रखी थी। कहते हैं कि 1 साल बाद पूर्व के कुछ विश्नोई व्यापारी बेलगाड़ी में माल लादकर चित्तौड़ पहुंचे थे, वहां उन्होंने माल बेचा तो वहां के राज कर्मचारियों ने उनसे चुंगी मांगी इस पर उन्होंने कहा कि हम गुरु जांभोजी के शिष्य हैं, और हमारी चुंगी माफ है ।इस बात को लेकर दोनों पक्षों में विवाद हो गया तब राज कर्मचारियों ने इन्हें झाली रानी के सामने पेश किया झाली रानी ने कहा कि यदि गुरु जांभोजी चुंगी नहीं लेने के लिए कह देंगे तो आप से चुंगी नहीं ली जाएंगी ।इस पर झाली रानी ने अपने दो विश्वासपात्र सेवकों को दो बिश्नोईयों के साथ समराथल भेजा वहां पहुंच कर उन्होंने गुरु जांभोजी को सारी घटना सुनाई। तब गुरु जांभोजी ने सेवकों से विश्नोईयों से चुंगी नहीं लेने की बात कही और साथ ही रानी के प्रतीक एक 'शब्द'भी कहा। उन्होंने सेवकों से कहा कि यह शब्द झाली रानी को सुना देना जिससे रानी को अपना पूर्व जन्म याद आ जाएगा। इसके साथ ही गुरु जांभोजी ने सोवन नगरी से लाई गई वस्तुओं में से झारी, माला एवं सुलझाणी भी रानी के लिए भेंट स्वरूप भेजी। यह घटना संवत 1572 के आसपास की मानी जाती है। तभी से राणा सांगा एवं झाली रानी गुरु जांभोजी की आज्ञा का पालन करने लग गए थे ,बाद में राणा सांगा भी गुरु जांभोजी से मिलने समराथल पर गए थे। वहां उन्होंने अपने राज्य में बिश्नोईयों को बसाने की प्रार्थना गुरुजी से की थी ,इस पर गुरु जांभोजी ने आज्ञा दी कि पूर्व के जो व्यापारी तुम्हारे राज्य में आए थे उन्हीं को ही अपने राज्य में बसा लो ।इस आधार पर भीलवाड़ा, दरीबा, समेलिया आदि गांवों में विश्नोई बस गए थे। कहते हैं कि बाद में झाली रानी जांभोलाव तालाब की खुदाई के समय स्वयं वहां गई थी , और तालाब के लिए धन भी दिया था।
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