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गुरु जंभेश्वर की शिक्षाओं को अपनाकर कोरोना जैसी हर महामारी को भगाएं

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आज पूरे विश्व के सामने कोरोनावायरस महामारी ने विकराल रूप धारण कर लिया है ।कीं वर्षों के अंतराल पर किसी ना किसी छोटी या बड़ी बीमारी से मानव को कष्ट सहने ही पढ़ते हैं, इससे आज लाखों जान जा चुकी हैं ।और बहुत से लोग देश और दुनिया में संक्रमित हैं। कोरोना महामारी से बचने और भविष्य में इस प्रकार की आपदा से हमारा सामना ना हो, उसके लिए प्राणी मात्र को जीने का उत्तम मार्ग बताने वाले श्री गुरु जंभेश्वर भगवान के उपदेशों पर चलना परम आवश्यक है। उन्होंने आज से लगभग 550 वर्ष पूर्व भविष्य की इन सभी भयानक आपदाओं को महसूस कर लिया था ।और इससे बचने के लिए ही शब्दवाणी और 29 धर्म -नियम रूपी सुरक्षा  कवच प्रदान किया ।वाणी का प्रत्येक शब्द अपने आप में एक ग्रंथ के समान है, और हर शब्द हमें असंख्य शिक्षाएं प्रदान करता है। आइए जानते हैं गुरु जंभेश्वर भगवान द्वारा बताए गए इन उपदेशों को, जिन्हें मानकर आज हम इस भयानक आपदा से बच सकते हैं।     01 प्रकृति से तालमेल बना जीवन जीना आज जरूरत है कि इंसान इस बात को समझे की प्रकृति और अन्य जीव-जंतुओं को हानि पहुंचा कर किसी का भी जीवन कभी सुखी नहीं हो...

राणा सांगा एवं झाली रानी द्वारा गुरु जांभोजी की आज्ञा मानना:-

मेवाड़ के राणा सांगा और झाली रानी गुरु जांभोजी के विचारों से बहुत प्रभावित थे। गुरु जांभोजी के उपदेशों से प्रभावित होकर वे उनकी आज्ञा का पालन करते थे। गुरु जांभोजी की शिक्षा के कारण ही राणा सांगा ने अपने राज्य में बिश्नोईयों के लिए चुंगी माफ कर रखी थी। कहते हैं कि 1 साल बाद पूर्व के कुछ विश्नोई व्यापारी बेलगाड़ी में माल लादकर चित्तौड़ पहुंचे थे, वहां उन्होंने माल बेचा तो वहां के राज कर्मचारियों ने उनसे चुंगी मांगी इस पर उन्होंने कहा कि हम गुरु जांभोजी के शिष्य हैं, और हमारी चुंगी माफ है ।इस बात को लेकर दोनों पक्षों में विवाद हो गया तब राज कर्मचारियों ने इन्हें झाली रानी के सामने पेश किया झाली रानी ने कहा कि यदि गुरु जांभोजी चुंगी नहीं लेने के लिए कह देंगे तो आप से चुंगी नहीं ली जाएंगी ।इस पर झाली रानी ने अपने दो विश्वासपात्र सेवकों को दो बिश्नोईयों के साथ समराथल भेजा वहां पहुंच कर उन्होंने गुरु जांभोजी को सारी घटना सुनाई। तब गुरु जांभोजी ने सेवकों से विश्नोईयों से चुंगी नहीं लेने की बात कही और साथ ही रानी के प्रतीक एक 'शब्द'भी कहा। उन्होंने सेवकों से कहा कि यह शब्द झाली रानी को...

शहीद स्थल खेजड़ली:-

यह जोधपुर से लगभग 22 किमी दक्षिण में स्थित है। 'खेजड़ली के खडाणे 'की घटना जोधपुर के तत्कालीन राजा अभय सिंह के शासनकाल की हैं ।संवत 1787 में राजा अभय सिंह के वजीर गिरधरदास भंडारी अपने कारिंदो एवं मजदूरों को लेकर खेजड़ली गांव में खेजड़ी के वृक्ष को काटने पहुंचा ।बिश्नोईयों ने वृक्ष काटने का विरोध किया पर भंडारी पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने शक्ति के नशे में वृक्ष काटने प्रारंभ कर दिए तभी वहां के आसपास के 84 गांव के विश्नोईयों ने वृक्षों की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने प्रारंभ कर दिए इस घटना की पूर्णाहुति संवत 1787 की भादवा सुदी दशमी मंगलवार को हुई, जिसमें 363 स्त्री पुरुष शहीद हो गए। इन शहीदों की याद में यहां सन 1978 से भादवा सुदी दशमी को मेले का निरंतर आयोजन हो रहा हैं। इस मेले को प्रारंभ करवाने में स्व.संतकुमार  जी राहड  का विशेष योगदान रहा है ।यह मेला बिश्नोई समाज के वृक्ष -प्रेम का प्रतीक है ।यहां शहीदों की स्मृति में एक शहीद स्मारक बना हुआ है ।आज यह एक विश्व प्रसिद्ध स्थान बन गया है। अब समाज इसे एक विश्व प्रसिद्ध  धरोहर के रूप में विकसित करने का प्रयास कर रहा ...

विश्नोई समाज के प्रमुख तीर्थ स्थल:-

01.पीपासर (जिला नागौर, मुकाम (नोखा बीकानेर)से 16 किमी .दक्षिण और नागौर से 54 किमी उत्तर में) यह जांभोजी का जन्म स्थान है वर्तमान साथरी उनके घर की सीमा में ही है । जिस कुएं के पास जांभोजी ने पहला शब्द का था वह गांव में है और अब बंद कर दिया गया है। कूंए ओर साथरी के बीच एक पुराना खेजड़ा है, जहां राव दूदा ने अपना घोड़ा बांधा था । साथरी की पूर्व दिशा में 'पैनोरमा 'बनाया हुआ है ,जिसमें जांभोजी का जीवन वृत दिया हुआ है। 02.समराथल (जिला -बीकानेर, नोखा से 20किमी. दूर) बिश्नोई पंथ की स्थापना इसी धोरे पर की थी। 51वर्ष तक यही जांभोजी का मुख्य स्थान रहा। यह एक बहुत ऊंचा धोरा है, जहां जांभाणी परंपरा के आगुणी व आथुणी जागा के संतों के आश्रम बने हुए हैं। जांभोजी इस धोरे के शिखर पर बैठकर हवन करते थे, या भव्य मंदिर बना हुआ है चारों और हरि कंकेड़ी के वृक्ष है ।इसका दूसरा नाम धोक धोरा है धर्म प्रचार करते हुए जांभोजी यहीं आकर विराजते थे। इसे सोवन नगरी ,थल,सम्भरी आदि नामों से भी जाना जाता है। 03.लोहावट(जिला -जोधपुर ,फलोदी से 32किमी. दक्षिण की ओर) लोहावट रेलवे स्टेशन से लोहावट साथरी 3 किमी. पूर्व की ओर...

जांभोजी का वंश परिचय:-

महाराजा विक्रमादित्य के 29 वें वंशधर  धारा नगरी के राजा भोज हूए और उनकी 9वीं पीढ़ी में पीपासर के रावलजी अपर नाम रोलोजी परमार(पंवार) क्षत्रिय हुए। रोलोजी के पुत्र लोहटजी  थे ।और इन्ही लोहटजी के यहां जांभोजी ने अवतार लिया था। रावलजी व रोलोजी  एक ही नाम है ।रोलोजी  उमर शाखा के  पंवार थे। रोलोजी कि मोहिलानी धर्मपत्नी राजाधिदेवी  से लोहटजी व पुल्होजी  का जन्म हुआ था ।उनके एक कन्या तांतू भी हुई थी । यह तीनों सगे भाई बहन थे और लोहटजी इन सब में बड़े थे।

जम्भेश्वर भगवान द्वारा बताए गए 29 नियम:-

जांभोजी अपने 29वें 'इलोल सागर' शब्द में फरमाते हैं-  'सांझे जमो ,सवेरे थापण  गुरु की नाथ डरीलो।'  सांयकाल (रात्रि) में हरिकीर्तन, प्रातः हवन वह पाहल विश्नोई को अभीष्ट है। 29 नियम रूपी मेरी नाथ अर्थात सद्गुरु की मर्यादा का अंकुश है इनका पालन पूर्णतया करने पर सच्चा विश्नोई कहलाता है‌। नियम 01. 30 दिन सूतक रखना:- बच्चे को जन्म देने वाली माता को 30 दिन तक घर के कार्यों को हाथ लगाना गाय दुहना अधिकारियों से निवृत्ति लेनी चाहिए नियम 02. पांच दिन ऋतुवन्ती न्यारो:- 5 दिन रजस्वला (रजोधर्म) स्त्री का पार्थक्य।  मासिक धर्म स्त्रियों को भी उक्त सारे कार्य वर्जित होते हैं भूमि पर टाट सन पर सोना चाहिए खाने-पीने के बर्तन अलग रखना चाहिए। नियम 03.सेरा करो स्नान:- आसनोजी भाट की बही में जांभोजी के कथन को उद्धृत करते हुए लिखा गया है कि प्रातः मुंह अंधेरे शरीर को रोमावाली न दिखे तब तक स्नान कर लेना चाहिए। काफी वर्ष पहले की बात है एक बार एक संत महापुरुष मेरे द्वार पर आए और यह वचन कहे- भक्त सुबह 3:00 बजे उठकर शौच आदि से निवृत्त होकर जो स्नान कर लेता है उसको एक मन मोती दान करने का फल मिलता ह...

बिश्नोई पंथ की स्थापना -कब व क्यों?

विक्रम संवत 1542 (सन 1485 ) भयंकर अकाल पड़ा। लोग मालवा की ओर पलायन कर रहे थे ।समराथल धोरे पर जांभोजी विराजमान थे ।जांभोजी ने उन्हें धोरे के नीचे स्थित नाडिये की मिट्टी ऊपर डालने के एवज में पर्याप्त अन देने का वचन दिया लोगों का पलायन रूक गया। उन्हें खाने को अन्न व बरसात होने पर बीज बोने के लिए भी बीजू की व्यवस्था की ।भंगवी चादर के नीचे से आवश्यकतानुसार अन्न लेने पर भी अटूट अन्न भंडार से उन्हें जांभोजी पर अटूट श्रद्धा हो गई ।29 नियमों का पालन करने से धन की पूर्ति का भरोसा दिया ।विक्रम संवत 1542 (सन् 1485)कि कार्तिक वदी अष्टमी को जांभोजी ने बिश्नोई पंथ की स्थापना की ।स्थापना में जांभोजी के खून के रिश्ते के चाचा पुल्होजी ने सशरीर स्वर्ग दिखाने की कामना की। जांभोजी ने मनसा रूपी विमान बनाकर उन्हें स्वर्ग दिखाया। वापस आने पर हवन करके पाहल बनाया और सबसे पहले पूलहोजी को बिश्नोई पंथ में दीक्षित किया इस प्रकार  पूल्होजी बिश्नोई पंथ के प्रथम विश्नोई हुए ।29 नियम की पालना रुपी मर्यादा के पालन को आबद्ध किया। सभी प्रकार के नशों के वर्जन वह भगवान विष्णु के ध्यान ,जप व हवन रूपी विश्नोई पंथ के 29 नि...